हम खेलते नहीं, सिर्फ खेलने के लिए…

खेल के प्रति हमारी सच्चाई इसी बात से समझी जा सकती है कि हमारे पास खेल की सारी वस्तुएँ और समय न होने के बावजूद, हम अपने आसपास की चीज़ों से ही क्रिकेट का बैट, बॉल, पूरा स्टेडियम और खेलने के लिए दो टीमें बना लेते हैं। हमारा जनरेटर के तेल का डब्बा विकेट बन जाता है, फावड़ा हमारा बैट, और निर्माण स्थल हमारा स्टेडियम।

आज के समय में, जब खेल एक इंडस्ट्री का रूप ले चुका है, हमारे लिए खेलना अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों को भूलने का एक बहाना होता है। यह गाँव के सभी लोगों के साथ किसी परदेश में भी अपना एक छोटा-सा गाँव बसाने जैसा होता है। हम खेल पैसों के लिए नहीं, बल्कि अपने शरीर में कम होती ऊर्जा को भरने के लिए खेलते हैं। अपने बिखरे हुए गाँव के लोगों को समेटने के लिए खेलते हैं। हम क्रिकेट इसलिए खेलते हैं ताकि परदेश में बिखरे हुए अपने टुकड़ों को जोड़ सकें—और भी कई कारणों से खेलते हैं, पर पैसों के लिए नहीं।

खेल के प्रति हमारी सच्चाई इसी बात से समझी जा सकती है कि हमारे पास खेल की सारी वस्तुएँ और समय न होने के बावजूद, हम अपने आसपास की चीज़ों से ही क्रिकेट का बैट, बॉल, पूरा स्टेडियम और खेलने के लिए दो टीमें बना लेते हैं। हमारा जनरेटर के तेल का डब्बा विकेट बन जाता है, फावड़ा हमारा बैट, और निर्माण स्थल हमारा स्टेडियम। पूरा नीला आसमान हमारा दर्शक होता है, जो अपना सपोर्ट हवा और धूप के माध्यम से करता है—अगर खेल अच्छा हुआ, तो नरम हवाएँ चलती हैं, जो हमारे पसीने को ठंडा कर देती हैं; और अगर खेल में मज़ा नहीं आया आसमान को , तो कड़ी धूप से यह हमें अपने असंतोष का एहसास करा देती है। यह सब दिखाता है कि हम मज़दूर अभावों को भी संभावनाओं में बदल देते हैं।

इस तस्वीर को ज़रा ध्यान से देखिए और सोचिए—क्या यह क्रिकेट खेलते हुए कुछ लोगों की बस एक साधारण तस्वीर है, या कुछ और? अगर आप इसे ध्यान से देखेंगे और थोड़ा सोचेंगे, तो आपका जवाब ‘ना’ में ही होगा। चलिए, अब जब हमने अपने बारे में बता दिया कि हम परदेश में क्रिकेट क्यों खेलते हैं, तो आप भी हमें बताइए—आप परदेश में क्यों खेलते हैं ? अरे, सवाल तो यह होना चाहिए की आप खेलते भी हैं परदेश में ? क्या खेलते हैं ? यह कोई भी खेल हो सकता हैं | चाहे वह क्रिकेट हो या कोई और खेल ? आपके जवाब का इन्तेजार रहेगा हमें |

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Kumar is a content creator and stand up comedian.

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